Sunday, September 21, 2014

मैं चाहता हूँ

१. 

मैं चाहता हूँ 
शाम भी सुबह सा दिखूं 
पहचान सकूँ खुद को। 
मैं चाहता हूँ 
मैं मैं रहूँ, तुम तुम रहो, पूरे दिन। 

२. 

मैं चाहता हूँ 
ठण्ड कम होते, परिंदे लौट जाएं 
वापस हों अपने घर अपने वतन। 
मैं चाहता हूँ 
मेरे अपने भी प्रवास से लौंटें। 

३. 

मैं चाहता हूँ 
मूक स्वर, विस्मृत लिपि से परे 
टिक सकें भावनाएं। 
मैं चाहता हूँ 
कोई भी बोली, गाए प्रेम गीत ही।  


Saturday, September 20, 2014

मन गिनता है, अघटित भी ज़िन्दगी।

१. 

भ्रम है
रक्त लाल है, गाढ़ा या पतला।
लाल जब आपकी बारी हो 
हालत पतली, तो पीला।
बारी बारी सफ़ेद काला खून, बहुरूपिया। 

२. 

यूँ तो 
वर्षारंभ या अन्य दिन कुछ नहीं, दिन होने के सिवा।  
पर इंतज़ार रहता है 
वर्षांत का। 
इसी इंतज़ार में इज़ाज़त है, वर्ष भर खुद को घसीटने की। 

३. 

बचा नहीं 
बचपन न बचा यौवन। 
देह औ मन का ताप हुआ ठंडा 
फिर भी 
मन गिनता है, अघटित भी ज़िन्दगी। 


Friday, September 19, 2014

जबकि पता है मुझे

१ 

जबकि पता है मुझे 
शब्द से बेहतर, न जगह कोई, आशा हेतु
निज मन पाल रखा हूँ। 
साथ मेरे, बुझती जाती हैं आशाएं। 

२. 

जबकि पता है मुझे 
दिन है उजाला, बिन रोशनी का वक़्त, रात 
उदास मापांक से नापता मैं, वक़्त। 
वक़्त के बस दो चहरे, उदास या गुलज़ार। 

३. 

जबकि पता है मुझे 
शक्ल साम्य होना अचरज नहीं, इन दिनों 
एक ही साँचा गढ़े तमाम लोग। 
मेरे चहरे पर न चढ़ा कोई और चेहरा। 





Thursday, September 18, 2014

मैं चाहता हूँ-किस्से हों अजर अमर।

१.

मैं चाहता हूँ
खुले पल्लों की हों खिड़कियाँ
न केवल हवा, बादल भी चले आएं अंदर।
मैं चाहता हूँ 
बच्चे खेलें, गेंद आ जाए कभी कभी। 

२. 

मैं चाहता हूँ 
नानीयां हों  उम्रदराज़
शाम से नींद तक चले किस्से। 
मैं चाहता हूँ 
किस्से हों अजर अमर। 

३. 

मैं चाहता हूँ 
बाद शब्द की मौत भी, लिखे कोई प्रेम पत्र 
ज़िंदा रहे चाहत, आशक्त -अनाशक्त। 
मैं चाहता हूँ 
प्रेम परे हो काव्य उम्र के। 


Wednesday, September 17, 2014

मुझे पता होता है


१.

अंदाज़े से परे
मेरा ही मन लगा रहा होता है, एक और अंदाज़ा। 
मुझे पता होता है
जब गलत होते हैं, सभी दांव मेरे। 

२. 

पता चले तुम्हे 
पूर्व इसके, बदल लेता हूँ मैं अपना चोला। 
पढ़ते रहते तुम चेहरा 
जब तुम्हारे अंतरतम, पलते हैं सपने मेरे। 

३.

क्या खूब आसान 
मेरी चाहत की बस्ती, बिना मोड़, विराम बिना।
योजनाओं की जद में  
खुद केंद्रित, सायास घाव करते, घात मेरे। 





Sunday, September 14, 2014

ज़िन्दगी बोर है, तुम्हारे बिना।

१. 

लम्बी बरसात 
बोर होती है, बिना चमक 
ज़िन्दगी बोर है, तुम्हारे बिना। 

२. 

अनवरत बरसात 
भिगो देती है धरती, धरती की हरयाली 
मन और सूख जाता, तुम्हारे बिना। 

३. 

बरसात कभी कभी 
दरकचा देती है, घर की दीवारें 
नींव ढहती मेरी, तुम्हारे बिना। 









Saturday, September 13, 2014

मैं चाहता हूँ

१. 

मैं चाहता हूँ 
अंत न हो अनंत का 
अंत के बाद भी बचा रहे कुछ तो। 
मैं चाहता हूँ 
ब्रह्माण्डांत, बसे एक और दुनिया। 

२. 

मैं चाहता हूँ 
मृत्यु के साथ ख़त्म हो जीवन
मौत बार बार, न हो किसी के लिए। 
मैं चाहता हूँ
ज़िंदा रहने का हक़ हो, मरने तक। 

३. 

मैं चाहता हूँ
उजाला रहे, दिन के अस्तित्व परे 
काल गड़ना तक न सिमटे सूरज। 
मैं चाहता हूँ 
रात दिन न मुहताज हो कैलेंडर के।