Sunday, September 28, 2014

बंद कर दो पढ़ना झूठा इतिहास।


मान लो, खुद चुन सको पैदा होने या मरने का समय। 
मान लो और चुनो एक समय खुद की पैदाइश का। 
चाहोगे पैदा होना किसी महान समय 
मसलन अशोक या अकबर के समय ?
मुझे जवाब पता है 
तुम नहीं चाहोगे चुनना मौत कलिंग या चित्तौड़ में। 
बंद कर दो पढ़ना झूठा इतिहास। 
और बंद कर दो वर्तमान को कलंकित करना। 




Wednesday, September 24, 2014

अपराध से काम तो नहीं खुश होना।

१. 

तमाम बातों के बाद भी 
बची रह जाती हैं ज़रूरी बातें। 
मुद्दतों बाद तुम्हारे जाने के,
बची रह जाती है, थोड़ी रात। 

२. 

दुहराना ज़िन्दगी को, नागवार। 
एक ही मंत्र का पुनरुच्चार 
अभिव्यक्ति का दुहराव
प्रेम का पुनः प्रेषण, नागवार। 

३. 

फ़र्क़ है हंसी और ख़ुशी में
हंसती हुई कामकाजी औरतें खुश तो नहीं। 
इस क्रूर समय में 
अपराध से काम तो नहीं खुश होना। 




Sunday, September 21, 2014

मैं चाहता हूँ

१. 

मैं चाहता हूँ 
शाम भी सुबह सा दिखूं 
पहचान सकूँ खुद को। 
मैं चाहता हूँ 
मैं मैं रहूँ, तुम तुम रहो, पूरे दिन। 

२. 

मैं चाहता हूँ 
ठण्ड कम होते, परिंदे लौट जाएं 
वापस हों अपने घर अपने वतन। 
मैं चाहता हूँ 
मेरे अपने भी प्रवास से लौंटें। 

३. 

मैं चाहता हूँ 
मूक स्वर, विस्मृत लिपि से परे 
टिक सकें भावनाएं। 
मैं चाहता हूँ 
कोई भी बोली, गाए प्रेम गीत ही।  


Saturday, September 20, 2014

मन गिनता है, अघटित भी ज़िन्दगी।

१. 

भ्रम है
रक्त लाल है, गाढ़ा या पतला।
लाल जब आपकी बारी हो 
हालत पतली, तो पीला।
बारी बारी सफ़ेद काला खून, बहुरूपिया। 

२. 

यूँ तो 
वर्षारंभ या अन्य दिन कुछ नहीं, दिन होने के सिवा।  
पर इंतज़ार रहता है 
वर्षांत का। 
इसी इंतज़ार में इज़ाज़त है, वर्ष भर खुद को घसीटने की। 

३. 

बचा नहीं 
बचपन न बचा यौवन। 
देह औ मन का ताप हुआ ठंडा 
फिर भी 
मन गिनता है, अघटित भी ज़िन्दगी। 


Friday, September 19, 2014

जबकि पता है मुझे

१ 

जबकि पता है मुझे 
शब्द से बेहतर, न जगह कोई, आशा हेतु
निज मन पाल रखा हूँ। 
साथ मेरे, बुझती जाती हैं आशाएं। 

२. 

जबकि पता है मुझे 
दिन है उजाला, बिन रोशनी का वक़्त, रात 
उदास मापांक से नापता मैं, वक़्त। 
वक़्त के बस दो चहरे, उदास या गुलज़ार। 

३. 

जबकि पता है मुझे 
शक्ल साम्य होना अचरज नहीं, इन दिनों 
एक ही साँचा गढ़े तमाम लोग। 
मेरे चहरे पर न चढ़ा कोई और चेहरा। 





Thursday, September 18, 2014

मैं चाहता हूँ-किस्से हों अजर अमर।

१.

मैं चाहता हूँ
खुले पल्लों की हों खिड़कियाँ
न केवल हवा, बादल भी चले आएं अंदर।
मैं चाहता हूँ 
बच्चे खेलें, गेंद आ जाए कभी कभी। 

२. 

मैं चाहता हूँ 
नानीयां हों  उम्रदराज़
शाम से नींद तक चले किस्से। 
मैं चाहता हूँ 
किस्से हों अजर अमर। 

३. 

मैं चाहता हूँ 
बाद शब्द की मौत भी, लिखे कोई प्रेम पत्र 
ज़िंदा रहे चाहत, आशक्त -अनाशक्त। 
मैं चाहता हूँ 
प्रेम परे हो काव्य उम्र के। 


Wednesday, September 17, 2014

मुझे पता होता है


१.

अंदाज़े से परे
मेरा ही मन लगा रहा होता है, एक और अंदाज़ा। 
मुझे पता होता है
जब गलत होते हैं, सभी दांव मेरे। 

२. 

पता चले तुम्हे 
पूर्व इसके, बदल लेता हूँ मैं अपना चोला। 
पढ़ते रहते तुम चेहरा 
जब तुम्हारे अंतरतम, पलते हैं सपने मेरे। 

३.

क्या खूब आसान 
मेरी चाहत की बस्ती, बिना मोड़, विराम बिना।
योजनाओं की जद में  
खुद केंद्रित, सायास घाव करते, घात मेरे।